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शनिवार, 30 जनवरी 2010

22. उडा़न




मुझे बेदख़ल क्या करेगा ज़माना

मेरा आशियां तो खुला आसमां है


शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

15. जिन्दगी

देखता हूँ जब भी तुझको, गौर से मैं जिन्दगी

सोचता हूँ क्या समझ पाऊँगा तुझको जिन्दगी

क्या कहूं मैं साँस के आवागमन को जिन्दगी

या भरा हो जोश तब मानूं मैं उसको जिन्दगी

जोश में हरदम रहे चैतन्य-रूपा जिन्दगी

जो नशे में डोलती क्या ख़ाक है वो जिन्दगी

डरते-डरते जी रहे, किस काम की यह जिन्दगी

भय को जो भयभीत कर दे, है निडर वह जिन्दगी

जब से थामा हाथ मेरा, है तूं मेरी जिन्दगी

यह मेरा  सम्बंध है; बंधन नहीं है जिन्दगी

आज मेरा है ईरादा; और वादा जिन्दगी।

जिन्दगी भर साथ ना छोडूंगा तेरा जिन्दगी॥

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

13. 'सुख – दुःख'


भूल गए वर्षों के सुख को,
दुःख के कुछ दिन याद रहे।
मधुरिम स्मृतियां विस्मृत कर दी,
कड़वाहट ले साथ चले॥

क्या कारण है हम रखते हैं,
हर दम दुःख को साथ सदा।
जो पाया सब भूल गए,
जो ना पाया सो याद रहा॥


ऐसा ना हो इस जीवन में,
गलती ऐसी कर जाएं।
सुख को तो अनदेखा कर दें,
दुःख-स्मृतियां संजो जाएं॥


विश्लेषण जब लोग करेंगे,
एक सार होगा सबका।
जीवन भर थी यही शिकायत,
'रात मच्छर की – दिन मक्खी का'

रविवार, 20 सितंबर 2009

7. पाथेय

चार दिनों की कर तैयारी,

साथ चले थे जीवन-साथी।

करें अचंभा, अनजाने ही,

कब इतना पाथेय कर लिया॥


                              
पार कर रहे जीवन-गंगा,

जल का भरके पात्र धर लिया।

नाव खा रही है हिचकोले,

ये कैसा पाथेय कर लिया॥


छोटा सा तो सफ़र कर रहे,

सिर पर इतना भार धर लिया।

पग डग में करते हैं डगमग,

क्यों इतना पाथेय कर लिया॥

साधारणत: सफ़र में क्षुधापूर्ति के लिए साथ लिए गए खाद्यान्न को पाथेय कहा जाता है| यहाँ  जीवन के सफ़र में काम आ सकने  की कल्पना कर संचित की गई वस्तुओं को; व्यापक सन्दर्भ में पाथेय कहा गया है|

रविवार, 13 सितंबर 2009

4. मैं मेरा और मेरा मैं


मैं ही वादी - मैं प्रतिवादी

मैं ही न्यायाधीश यहां।

मन की अदालत- मन की गवाही

मन का ही विश्वास यहां॥


 
...............नहीं यहां पर संगी साथी,

...............नहीं सूझती राह यहां।

...............चिंता मेरी-चिंतन मेरा,

...............मेरा मुझको साथ यहां॥


 प्रहरी बना मैं शीश महल का,

जागूं सारी रात यहां।

कंकर पत्थर ले हाथों में,

मौका तकते लोग यहां॥


...............सबके सुख की करूं कामना,

...............सुखी सभी हों लोग यहां।

...............सपना मेरा अपना है पर,

...............सपने लेना दोष यहां॥


सभी यहां थे संगी साथी,

सभी स्वजन और मित्र यहां।

काम पडा़ जब नज़र घुमाई,

सभी पराए लोग यहां॥


 
इस रचना को जब भी पढ़ता हूँ ; मुझे स्व. पु.ल.देशपांडे की ये प्रसिद्ध  पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती हैं 'कसा मी; कसा मी;कसा मी कसा मी, जसा मी तसा मी; असा मी; असा मी' |

2. मेरा जीवन



मेरा जीवन कोरा कागज़,
हाशिए में जी रहा हूँ।
सोचने का वक्त दुर्लभ,
मैं सफ़र में ही रहा हूँ॥

दिनचर्या ख़ुद ही लिख जाती,
दिन भर बीती सारी बातें।
समय सोख लेता है सुर्खी,
मिट जाती हैं सारी यादें॥


जब चाहूँ मैं कुछ लिख डालूँ,
जानें कहाँ कलम खो जाती।
गहरा-चिंतन; पैनी-दृष्टि;
उस पल ही मुझको बिसराती॥


कलम मिली तो हुआ जरूरी,
ढूँढूँ अपनी शब्द सियाही।
भाषा में बदलाव आ गया,
स्याही मैंने सूखी पाई॥

सोच रहा हूँ लिखना छोडूँ ,
काम करूँ कुछ ऐसे दुष्कर।
पढ़ने का भी कष्ट न होवे।
लोग सराहें चित्र समझ कर॥