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सोमवार, 13 अगस्त 2012

36. वस्तुस्थिति



जो आप चाहें सो आप करें , यह स्वतंत्रता है


जो आप करें सो आप चाहें , यह प्रसन्नता है


इसीलिए नेता प्रसन्न हैं और जनता स्वतंत्र है


कुल मिला कर हम सभी इस देश में स्वच्छन्द हैं

सोमवार, 6 अगस्त 2012

35. जीवन की चर­भर



हार­जीत होती रहती है, जीवन की इस चर­भर में ,

कभी रोशनी कभी अंधेरा, होता रहता महफ़िल में ।

बाजी अभी नहीं हारी है, खेल अभी भी बाकी है ,

अपने पर भी रखें भरोसा, रहे आस्था ईश्वर में ॥



कष्ट सदा ही साथ चले थे , नज़र घुमा कर तो देखो ,

मगर हौसले बने रहे थे , खुशियां भी थी आंगन में ।

होनी खेल अनोखे खेले , शर्तें उसकी अपनी है ,

छूटे हों अधिकार भले ही , भूल न हो कर्तव्यों में ॥



नींद उचट जाती आंखों से , संवेदित जब होता मन ,

स्वप्न तिरोहित हो जाते हैं , अंधकार लगता जीवन ।

चिन्ताएं जो आज लग रही , घुल जाएगी सपनों में ,

कुछ तो अपने होते ही हैं , कुछ बन जाते हैं अपने ॥



रविवार, 1 अप्रैल 2012

33. ‘राम-भक्त हनुमान’

‘राम-भक्त हनुमान’



'रोम-रोम' में राम पर, जिनको था अभिमान

हृदय राम-दरबार का, सबको मिला प्रमाण

उन्हीं राम के भक्त की, निष्ठा का कर ध्यान

लिखा नाम 'श्रीराम' का, छबि में थे हनुमान


राम-राम लिख चित्र पर, किया प्रयोग विचित्र

लोगों तक पहुंचा दिया, अनुपम राम चरित्र

परमेश्वर में आस्था, अंतर्मन विश्वास

लगन एक 'श्रीराम' में, जीवन हुआ सुवास

[  ईश्वर से तारतम्यता के सबके अपने-अपने तरीके हो सकते हैं | किसी अन्य के विचारों के अनुकरण का मार्ग कदाचित सहज जान पड़ता है क्योंकि अनुभव की कसौटी पर स्थापित होने का विश्वास उससे जुड़ा होता है |
अपने मन पर विश्वास, अपने निश्चय में द्ढ़ता, अपने स्वप्न साकार करने का संकल्प कुछ अनूठा मार्ग सुझा देता है जिस पर चलना ज्यादा रुचिकर व सहज लगने लगता है |
आस्था का ऐसा ही एक उदाहरण है रामभक्त हनुमान का यह अनुपम चित्र, जिसका अलंकरण 'राम-राम' की आवृति से किया गया है |
अब तक ऐसे सैंकड़ों चित्र बनाकर वितरित करना और भक्तिभाव प्रसारित करना भी  एक प्रकार की साधना है | ऐसी आस्था के प्रति आकृष्ट होना स्वाभाविक ही है और मन में उठी प्रतिक्रिया को शब्दों में व्यक्त करने का लोभ संवरण न कर पाना शायद कलम की मजबूरी ]

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

32. ‘मर्यादा पुरुषोत्तम राम’ - (2)


सोने की चिड़िया था भारत, सुन्दर सपने बीत गए
कर्ज-भार से ग्रसित व्यवस्था, सँसाधन सब रीत गए
भ्रष्टाचार चतुर्दिक फैला, कौन सँभाले बिगड़े काम
क्या कल युग में पैदा होंगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम
  
सत्ता-सुख पाने की खातिर, खुल के भ्रष्टाचार चला
वोटों को आकर्षित करने, वादों का व्यापार चला
प्रजातंत्र का पावन मंदिर, घोटालों से है बदनाम
क्या कल युग में पैदा होंगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम

खेल बना व्यापार यहां पर, खेल-भावना रोती है
जिसके हाथों में हो लाठी, भैंस उसी की होती है
विज्ञापन कर रहे खिलाड़ी, सब कुछ बेचें ले कर नाम
क्या कल युग में पैदा होंगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम

खेल आज खिलवाड़ बन गया, बिकते हैं सारे आयाम
पूर्व-नियोजित परिणामों से, पाते मनचाहा अंजाम
बिकवाली में खड़ा खिलाड़ी, खुले-आम होता नीलाम
क्या कल युग में पैदा होंगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम

[ लगभग ग्यारह वर्ष पहले मैंने 'क्या कल युग में पैदा होंगे, मर्यादा पुरुषोत्तम राम' शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसे इस ब्लॉग में सम्मिलित कर चुका हूँ । मेरी रचनाओं के एक प्रशंसक ने इसे और विस्तृत करने का आग्रह किया जिसके फलस्वरूप उपरोक्त कृति की रचना हुई । ग्यारह वर्षों के अंतराल का विषयवस्तु पर प्रभाव तो पड़ना ही था सो सामयिक सन्दर्भों में एक अलग प्रवाह लिए हुए यह रचना कैसी लगी, आपकी प्रतिक्रियाओं से ज्ञात होगा । ]

बुधवार, 2 जून 2010

30. अक्स

अक्स धुंधला सा दिखा,
पहचानने की भूल थी |
दोष नज़रों का नहीं था,
आइने पर धूल थी ||

अक्स था कुछ अजनबी सा,
क्या वजह क्या बात थी |
आज इन आंखों में फिर,
बरसों पुरानी याद थी ||

ढूंढती है अक्स अपना,
क्या हुआ है आंख को |
आइना क्यों कर के समझा,
नासमझ इस कांच को  ||


अक्स ने अक्सर किया वो,
काम जो करना न था |
क्या वजह थी, खोल डाला,
घाव जो भरना न था ||


आइने से शर्त है कि,
वो दिखे चाहे जहां |
सच अगर कहना ही है,
तो अक्स न आए वहां ||


मैं खडा़ निश्चल किनारे,
अक्स हिलते ताल में |
आज अपने ही फंसे हैं,
दूसरों के जाल में ||


बढ़ रही है उम्र लेकिन,
कौन यह बतलाएगा |
इस हकीकत की बयानी,
अक्स ही कर पाएगा ||


मैंने जीवन में चुना था,
ज्ञान के वरदान को |
अक्स उसका आंख से,
दिखता नहीं नादान को ||

-=-=-=-

तन का सजना सजा हो गया,
जब होवे दुखियारा मन |
अक्स झूठ की करे वकालत,
सत्य दफ़न है अंतर्मन ||

-=-=-=-

है हकीकत सामने,
केवल ये परछांई नहीं |
अक्स तो जाने है किन्तु,
तूं समझता ही नहीं ||

 
-=-=-=-

दिन महीने साल बीते,
पर समझ में आई ना |
धूल चेहरे पर लगी है,
पोंछते हो आईना ||

सोमवार, 24 मई 2010

29. मौन

किसने, कब, क्यों, कहां,

कितने, कैसे और कौन?

उत्तर मौन


मेरे प्रश्न का उत्तर

सदा से रहा है मौन


अब यदि भविष्य में

कभी कोई बोल फूटा

और यह मौन टूटा

मेरे लिए निरर्थक होगा,

क्योंकि मेरे प्रश्नों के सार्थक उत्तर

केवल मौन ने दिए हैं

बुधवार, 19 मई 2010

28. मुस्कान


मृदु हास्य की रेखा

जो मुंह से कान तक खिंच जाती है

मुस्कान कहाती है

मंगलवार, 11 मई 2010

27. चश्मा

1

मनमें विचार आया ; कैसा ये श्रृँगार पाया,

भरे बाजार धर दी इज्जत ही ताक पर।

मेरी ही आँखों से मुझे ही दिखाने वाला,

चश्मा सवार सरे-आम मेरी नाक पर॥

2

आँखों के आगे खडी़ काँच की दीवार;

दृश्य करदे साफ़ जब झाँकें उस पार।

ऐ नकचढी़-ऐनक बता है क्या ख़ता मेरी;

खींचती है कान मेरे तूँ क्यों बारँबार॥

3

प्राप्त हुई रचनाओं का करके सँपादन;

सँपादक-गण करते हैं जैसे प्रकाशन।

वैसे ही काम को आसान बना देता है;

चश्मा दूरी से पहचान बना देता है॥

4

चक्षुमित्र चष्मे को देखा जब गौर से;

पाया इसकी चेहरे से दुश्मनी पुरानी है।

आँखों को कैद कर हावी रहता नाक पर,

पकड़े दोनो कान सरे-आम कमानी है॥

5

खुद की ही आँखों से खुद को दिखाए दुनिया,

नज़र बँद करदे ये अद्भुत करिश्मा।

आँखों के ऐब में, चेहरे के रौब में,

सदा सहायक होता है चश्मा॥

6

ऐंठता है कान;

    रहता नाक पे सवार।

                    फिरभी नहीं शिकायत;

                 ये कैसा लोकाचार॥

रविवार, 18 अप्रैल 2010

26. कर्म-योगी

चाह नहीं क्रोध की; व्यक्ति के विरोध की

दोष वृत्ति मानकर; इनकी प्रवृत्ति जानकर

काम क्रोध मोह यश; भाव से नहीं विवश

शक्ति को सहेज कर; देख ले उठा नज़र

परिस्थिति निहार कर; फिर से तूं विचार कर

वक्त की पुकार है; मुक्ति की गुहार है

कर्म-योगी कर्म से; रुख बदल दे धर्म से

उठ तूं उठ के वार कर; धर्म-युद्ध जान कर

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

25. नज़र




 

नज़र घुमा कर हमने देखा, नज़रों वाले नज़र न आए
हालातों से नज़र चुराते, देख नज़ारा हम घबराए

आडंबर करते आकर्षित, किन्तु नहीं हमने अपनाए
सीधे सादे जीवन को ना, कोई बुरी नज़र लग जाए

नज़रों के इस नज़राने पर, गर्व करें, क्यों हम इतराऐं
जिसने उनको नज़र किया है, नज़र झुका,अहसान जताऐं

नज़र-बंद हो गई सभी की, सत्य नहीं स्वीकार कर रहे
बिन सामान खुली दुकानें, सपनों का व्यापार कर रहे

अंतरमन के वातायन से, उपरवाला झांक रहा है
दुनियादारी के दलदल में, कितने डूबे आंक रहा है

नज़रें ढूंढ रही थी जिनको, बहुत सताया नज़र न आया
थक कर बैठे, आंखें मूंदी, अंतरमन में उसको पाया

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

24. ‘दान’

पात्र देख कर दीजिए; द्रव्य-दक्षिणा-दान।
मन में पावन भाव हों; पास न हो अभिमान॥

पात्र पुत्र सा खोज कर; करें समर्पित द्रव्य।
गुण-क्षमता से हो भरा; सपने जिसके भव्य॥

जो खेतों को सींच दे; बढा़ सके व्यवसाय।
द्रव्य सौंप उस पुत्र को; हृदय सदा हरसाय॥

दिया दान तो क्या किया; किया नहीं अहसान।
मानवता के हवन में समिधा इसको जान॥

द्रव्यदान भी जब यहां चुका सके ना मोल।
धर पलडे़ पर दक्षिणा; लिया ग्यान  को तौल॥

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

23. दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह

1

मुश्किलें हैं सामने और जूझते हैं हम,

मंजिलें हैं कौन सी,यह पूछते हैं हम,

जी रहे हैं जिंदगी को बोझ की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

2

जो भी आया सामने वह काम कर लिया,

थक गया तो दो घडी़ आराम कर लिया,

हर हादसे को देखता हूं मौज की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

3

शांत मन से सोचूं दुनिया जागती देखूं,

चंचल मन से सोचूं दुनिया भागती देखूं,

दुनिया बदले रंग मेरे सोच की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

4

सोचता हूं काम का मैं ढंग बदल लूं,

रूप बदल लूं मैं नया रंग बदल लूं,

चाल ढाल कर लूं किसीऔर की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

5

है कलयुगी व्यापार का यह कैसा चमत्कार,

सब करते झूठ को सरे बाजार नमस्कार,

वो सर झुकाए जा रहा सच, चोर की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

6

भाव की अभिव्यक्ति को मिलते नहीं हैं शब्द,

लय के अभाव में यही है गीत का प्रारब्ध,

साज से सुर हैं निकलते शोर की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

7

जिंदगी का लक्ष मैं पहचानता नहीं,

जा रहा हूं किस दिशा यह जानता नहीं,

नियति है पतंग बंधी डोर की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

8

सामाजिक प्राणी है मानव,रहता है नियम से,

खाना-पीना-सोना सब-कुछ करता सही समय से,

नियमित और अनुशासित जीवन फ़ौज की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

9

एक वोट की ताक़त, सोचूं राज मिल गया,

प्रजातांत्रिक परंपरा में ताज मिल गया,

गंगू तेली सोचे राजा भोज की तरह,

दिन एक और बीत गया रोज़ की तरह॥

शनिवार, 30 जनवरी 2010

22. उडा़न




मुझे बेदख़ल क्या करेगा ज़माना

मेरा आशियां तो खुला आसमां है


21. सारा आकाश


मन पंछी क॓ पंख दो, आस और विश्वास |

सीमा रहित उडा़न को, है सारा आकाश ||

सोमवार, 25 जनवरी 2010

20. कर्मठ-योद्धा

कर्म-क्षेत्र के कर्मठ योद्धा,
जब भी कोई लक्ष्य बनाते
स्पष्ट सोच और नीति-नियोजित,
सही समय पर कदम बढा़ते
नियति को भी देखा जाता,
उन मौकों का लाभ उठाते
जीवन के अनमोल क्षणों से,
स्वर्णिम हस्ताक्षर कर जाते

[मेरी कुछ रचनाऐं किसी विशेष व्यक्ति के लिए अथवा विशेष परिस्थिति-वश लिखी गई| उनमें निहित व्यापकता को देखते हुए उन्हें यहां समाविष्ट कर रहा हूं| समावेष करने के समय का संयोग व्यक्ति-विशेष से करना भी एक प्रकार की भावाभिव्यक्ति ही मानता हूं, जिसे महसूस कर कुछ लोग आनन्द का अनुभव अवश्य करेंगे]

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

18. मितव्ययता में अनियमितता

नित नियम से हम पहुंच जाते नहाने के लिए,

छोड़ देते नल खुला, पानी बहाने के लिए।

तप रही है धूप बाहर रौशनी भरपूर है,

पर सड़क पर बत्तियां भी जल रही, मजबूर हैं॥

पान ठेले पर मिलें या चाय की दुकान पर,

रंज होता है मुझे इन अफ़सरों की शान पर।

इनसे तो कुर्सी ही अच्छी, खा रही ठंडी हवा,

देश की प्रगती की जाने, कौन सी होगी दवा॥

दृश्य ये कुछ आम हैं पर बात मेरी खास है,

इस तरह चलता रहा तो बस कयामत पास है।

इस धरा पर धारणा कुछ इस तरह की व्याप्त है,

जिसको जो भी चाहिए, सब कुछ यहां पर्याप्त है॥

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

17. सकारात्मक निश्क्रियता

क्या पाया सक्रिय होकर ?

न होते सक्रिय; न करते काम;

न होता नाम; न ही पहचान;

न होता राग; न होता द्वेश;

न होता मोह; न होता क्लेष;

न कोई जानता; न कोई मानता;

न होते पद; न होता मद;

न होते रगड़े; न होते झगड़े;

कितना अच्छा होता; गुमनाम सी जिन्दगी जीता;

कितनी सकारात्मक होती निश्क्रियता

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

16. कर्म-साधना

फंस के चक्रव्यूह में,शब्द के समूह में

भाव कुलबुला रहे,वक्त को बुला रहे

कभी तो वक्त आएगा,अनर्थ से बचाएगा

अर्थ-पूर्ण अर्थ को,न्याय तो दिलाएगा

तर्क अर्थघात कर,भाव पर प्रहार कर

स्वार्थ-सिद्धि कर रहा,चैन सबका हर रहा

खुद को तूं बुलंद कर,मुक्त कर स्वतंत्र कर

कर्म-साधना प्रखर,धर्म भावना मुखर

लक्ष्य वेधना मगर,हौसले सहेज कर

श्रम का हाथ थामना,पूर्ण होगी कामना

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

15. जिन्दगी

देखता हूँ जब भी तुझको, गौर से मैं जिन्दगी

सोचता हूँ क्या समझ पाऊँगा तुझको जिन्दगी

क्या कहूं मैं साँस के आवागमन को जिन्दगी

या भरा हो जोश तब मानूं मैं उसको जिन्दगी

जोश में हरदम रहे चैतन्य-रूपा जिन्दगी

जो नशे में डोलती क्या ख़ाक है वो जिन्दगी

डरते-डरते जी रहे, किस काम की यह जिन्दगी

भय को जो भयभीत कर दे, है निडर वह जिन्दगी

जब से थामा हाथ मेरा, है तूं मेरी जिन्दगी

यह मेरा  सम्बंध है; बंधन नहीं है जिन्दगी

आज मेरा है ईरादा; और वादा जिन्दगी।

जिन्दगी भर साथ ना छोडूंगा तेरा जिन्दगी॥

बुधवार, 4 नवंबर 2009

14. घटना

'घटना' को तो घटना ही था, जीवन घटनाओं का क्रम है।

कोई इसको सत्य मानता, कोई कहता केवल भ्रम है॥

जितने चिंतक उतनी बातें, अलग-अलग से दृष्टिकोण हैं।

एक कहे जीवन को मस्ती, कहे दूसरा चिंतन स्थल है॥

जैसे– जैसे उम्र बढ़ रही, जीवन घटता ही जाता है।

जीवन की इन घटनाओं का,
                                       दिन घटने से क्या नाता है ?